• हाल में 5 राज्यों के चुनावों के परिणाम जारी किए जा चुके हैं, बात उस दिन की है जब एक्जिट पोल के परिणामों पर शोर-शराबा हो रहा था। हमारे हिन्दी के अग्रणी समाचार पत्र दैनिक भास्कर ने एक कार्टून छापा, जिसमें लिखा गया था 'शाबाश, थोड़ा और जोर से.... जैसे-जैसे तुम्हारा बीपी बढ़ रहा है, वैसे-वैसे हमारी TRP (टेलीविजन रेटिंग पॉइंट) बढ़ रही है...।
  • इस कार्टून से साफ जाहिर होता है कि भास्कर समाचार पत्र का सीधा इशारा न्यूज चैनलों पर आरोप है कि टीआरपी बढ़ने से इन चैनल्स वालों को विज्ञापनों से उतनी ही अधिक कमाई होगी जितनी अधिक टीआरपी बढ़ेगी। 
  • और यह सच भी है कि जिस न्यूज चैनल की टीआरपी जितनी ज्यादा होगी उसे विज्ञापन दाता उतना ही अधिक पैसे देते हैं।  
  • अब आप पाठक समझ गए होंगे कि भास्कर वाले ने इतनी सच्चाई इस व्यंग्यात्मक रूप से कैसे बता दी।
  • सच तो यह है कि भास्कर वाले का कोई न्यूज चैनल नहीं है और ऐसे में उसे तो डिजिटल मीडिया से कमाई नहीं हो रही है फिर वो क्यों पीछे रहे आलोचना करने से कि एक्जिट पोल के माध्यम से डिजिटल मीडिया जनता को कैसे उल्लू बना कर अपना टीआरपी बढ़ रही है और जनता समझ नहीं रही है कि इससे विज्ञापनों की दरे बढ़ रही है, जिसका अप्रत्यक्ष रूप से असर मंहगाई पर भी पड़ता है। 
  • चलो, ये तो हुई डिजिटल मीडिया वालों की बात, खुद कितने दूध के धुले हुए हैं। ये कौनसे विज्ञापन नहीं करते हैं। 
  • पर भास्कर वाला भूल रहा है कि खुद भी अखबारों में खबरें कम और विज्ञापन ज्यादा देता है। जो उसकी आय का बड़ा जरिया है। 
  • चलो, जी सभी पाठक इस बात से तो परिचित है, ज्यादा क्या बताएं। 
  • चाहे, डिजिटल माध्यम हो या प्रिंट मीडिया, सभी विज्ञापनों से मोटी कमाई कर रहे हैं। हालांकि जनता को पेट्रोल/डीजल/गैस की महंगाई का शोर-शराबा भले ही इन मीडिया वालों द्वारा खूब किया जाता है किन्तु कभी विज्ञापनों पर ली जाने वाली मोटी कमाई का आमजन पर पड़ने वाले असर का नहीं दिखाते हैं। 
  • आय सबके लिए जरूरी है, किन्तु कहते हैं बौद्धिक वर्ग अपनी आय खुद तय करता है, वहीं मीडिया वाले भी यही कर रहे हैं। ये महंगाई पर भूचाल तो ला सकते हैं परंतु बेलगाम होते विज्ञापनों और उससे जुड़े लोगों पर तंज तक नहीं कसते हैं। जबकि आज के दौर में विज्ञापन भी महंगाई बढ़ाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। क्योंकि कंपनी अपना विज्ञापन बहुत से प्लेटफॉर्म पर देती है। 

  • जैसे- सबसे पहले विज्ञापन कंपनी को,
  • फिर एड बनाने वाली टीम को यदि वीडियो है तो ब्रांड एम्बेसडर का खर्च, वीडियो सूट, ए​डिटिंग का खर्च, ​
  • फिर टीबी पर, अलग-अलग चैनल, अखबार, आजकल तो गूगल एडसेंस आदि बहुत से माध्यम से 
  • विज्ञापनों पर अरबों रुपये खर्च हो रहे हैं, जिसका न मीडिया वाले जिक्र करते हैं और न अखबार वाले। 
  • सीधी बात है, कोई अपने पेट पर लात क्यूं मारेगा?

जयहिंद।