किस-किस से लडूं,
जब से याद संभाली है,
तब से,
लड़ता तो आया स्व से।
स्व अवरोधों से,
स्व प्रतिमानों से,
जीव तन एक पुतला है,
प्रकृति ने बनाया अलबेला है।
संघर्ष और संघर्ष,
प्रारब्ध से अंत तक,
जन्म से मृत्यु तक,
परिवार से समाज तक,
ईमान से धर्म तक,
कुरीतियों से नई रीति तक,
कोई हार मान लेता,
कोई पराजित उसे कर,



कोई कट्टरता पाले,
उसके वजूद को चुनौति देता।
यह जीवन है ज्ञात सभी को,
प्रकृति से परे नहीं।
प्रारब्ध से संघर्ष था,
लड़ा प्रकृति आपदाओं से,
नर ने गति पाई,
प्रकृति की गोद में,
धरा संगिनी बन,
खेला-कूदा प्रकृति संग,
सहोदरी थी वह,
नर के स्वाभिमान की।
उसका आंगन था महका,
हर जीव का घरौंदा,
कोई कंदराओं में,
तो कोई वृक्षों पर,
तो कोई हिमवासी था,
नर था कि भय में,
संघर्ष हर जीव से था,
कोई युक्ति न थी।
बस चाह थी,
खौफनाक जीवों और आपदाओं से,
स्वजन को,
भय से मुक्त कर।
श्रेष्ठ रचना में,
प्रकृति संग,
बौद्धिक प्रतिभा से,
रचा नर समाज।
यह समाज था या
संघर्ष था रिवाज बनने से।
कितना पारंगत हो, नर
लड़ा खौफनाक जीवों से,
किया पराजित अपूर्व शौर्य से,
बुद्धिबल की श्रेष्ठता से।
बुद्धिबल से नर,
थाम न सका प्रतिस्पर्द्धा को,
जब खौफ नर का जीव में,
व्याप्त हुआ प्रकृति में।
अब स्व लड़ता,
स्व से स्व श्रेष्ठता में।
कभी देश स्वाभिमान जगाता,
कभी धर्म का अभिमान जगाता,
कभी जाति की कट्टरता,
हित निज जनों के साधता।
परजन तो आंखों न सुहाता,
यह प्रतिस्पर्द्धा है बुद्धिवादी की,
यह प्रतिस्पर्द्धा है,
अब मानव सभ्यता पतन की।
संघर्ष मशीनों से क्या कम था,
जो अब आर्टिफिशियल इंटेलीजेन्स बनाया,
यकीन नहीं उस बुद्धिजीवी को,
मशीनी से हारा मानव श्रम है,
देखा मैंने उम्र के तीस वर्ष,
संघर्ष मेरा ही नहीं उस जीव का,
जिसने मानव सभ्यता का भार वहन किया।
किसान के खेतों में तो,
हाली संग कभी न थका जोतों में,
नई फसलों को शहरों तक,
कभी न थका मानव संग।
पर मानव कब रूकता यही तक,
उसने तो रची मशीनों संग नव सृष्टि,
यह भरत जन थोड़े था,
जो प्रकृति के जीवों को पूजा था,
यही तो हमारे पूर्व अतीत समृद्धि का कारण था,
तभी तो भारत भू स्वर्णजड़ित कहलाता था।
पर कब तक हम गौवंश को,
उस मशीन से प्रतिस्पर्द्धा में रख पाते,
भौतिकता संग नाता जो जोड़ा,
अब मशीनों से प्रतिस्पर्द्धा में,
हार गया गौवंश का बैल,
और भूमिपुत्र भी थकने लगा,
उस बुद्धिवादी की नीति से।
देख लो, ओ बुद्धिवादी
तेरी भौतिक प्रतिस्पर्द्धा में,
पर्यावरण पर संकट जो है,
फिर भी सजग नहीं है जन,
सिर्फ बातें और आरोप-प्रत्यारोप करते हैं,
अपने हित लाभ बाधित होने से डरते हैं।
कब सोचा भरत जन ने भौतिकवादी बनूं,
संरक्षण बुद्धिजीवी उनका करता अब,
जिनसे आमदनी बढ़े,
पूंजीवादी जन कब प्रकृति की बात करे।
गौवंश बचाने वाले,
आज रूढ़िवादी कहलाते हैं,
पर सच्चे अर्थों में तो वे ही प्रकृतिवादी कहलाते हैं।
किसान ही नहीं मानव सभ्यता का वाहक,
आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत है।
इन तीस वर्षों में,
मानव सभ्यता के वाहकों की दुर्गति,
मानव शारीरिक श्रम संग देखी है।
वक्त है चिंतन का,
भारतीय मानस का,
जिसने प्रकृति को जननी माना था,
बस हमें तो प्रकृति की गोद में,
संघर्ष सिर्फ जीवन का,
प्रकृति के संरक्षण से करने का,
विश्व मंचों से नहीं निज जीवन से,
हर दिन करना होगा।
कवि - 
राकेश सिंह