• बिजौलिया भीलवाड़ा जिले में स्थित हैं यहॉं किसान आंदोलन 1897 में प्रारम्भ तथा 1941 में समाप्त हुआ। बिजौलिया में मुख्यतः धाकड़ जाति के किसान थे।
  • भारत में संगठित कृषक आंदोलन प्रारम्भ करने का श्रेय मेवाड़ के प्रथम श्रेणी के ठिकाने बिजौलिया को है। बिजौलिया ठिकाने के संस्थापक अशोक परमार थे।
  • अशोक परमार अपने मूल स्थान जगमेर (भरतपुर) से मेवाड़ के राणा सांगा की सेवा में चित्तौड़ आ गया था। 1527 ई. में खानवा के युद्ध में अशोक की वीरता को देखते हुए राणा सांगा ने उसे ऊपरमाल की जागीर प्रदान की।
  • यहाँ के शासक राव कृष्णासिंह के समय बिजौलिया की जनता से 84 प्रकार की लागते ली जाती थी।
  • 1903 ई. राव कृष्णसिंह ने ऊपरमाल की जनता पर कन्या विवाह के अवसर पर 5 रूपये का ‘चंवरी कर’ लगाया। इसके विरोधस्वरूप किसानों ने कन्याओं के विवाह स्थगित कर दिए तथा किसानों ने ठिकाने की भूमि पर खेती करना बंद कर दिया। विवश होकर राव कृष्णसिंह ने चंवरी कर समाप्त कर दिया तथा लगान भी 40 प्रतिशत कर दिया।
  • बिजौलिया के किसान आंदोलन का नेतृत्व सर्वप्रथम साधु सीताराम दास द्वारा किया गया।
  • 1906 ई. में राव कृष्णसिंह की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी पृथ्वीसिंह ने ‘तलवार बंधाई’ की लागत (उत्तराधिकारी शुल्क) लगा दी। किसानों ने साधु सीताराम दास, फतहकरण चारण और ब्रह्मदेव के नेतृत्व में इस कार्यवाही के विरोध में 1913 ई. में ऊपरमाल के क्षेत्र को पड़त रखा और ठिकाने को भूमि कर नहीं दिया।
  • बिजौलिया के किसान आंदोलन में 1916 ई. में श्री विजयसिंह पथिक ने प्रवेश किया। विजयसिंह पथिक का मूल नाम भूपसिंह था। विजयसिंह पथिक ने ‘ऊमाजी के खेड़ा’ नामक स्थान को किसान क्रांति का केन्द्र स्थल बनाया।
  • पथिक ने 1917 ई. में श्री सीताराम दास एवं श्री माणिक्यलाल वर्मा के सहयोग से हरियाली अमावस्या के दिन ‘ऊपरमाल पंच बोर्ड’ नामक संगठन की स्थापना की तथा मन्ना पटेल को इस पंचायत का प्रमुख बनाया।
  • बिजोलिया ठिकाने में भूमि कर निश्चित करने के लिए ‘कूता प्रथा’ प्रचलित थी।
  • 1916 ई. में किसानों ने साधु सीताराम दास की अध्यक्षता में ‘किसान पंच बोर्ड’ की स्थापना की।
  • भारत सरकार के ए.जी.जी. हॉलैण्ड व किसानों के बीच समझौते के अनुसार 84 में से 32 लागतें माफ कर दी गई, अन्ततः 1922 ई. में आंदोलन समाप्त हो गया, लेकिन ठिकाने ने समझौते का पालन नहीं किया।
  • श्री गणेश शंकर विद्यार्थी संपादित एवं कानपुर से प्रकाशित समाचार पत्रा ‘प्रताप’ के माध्यम से तथा इसके साथ ही अभ्युदय, भारत, मित्र, मराठा आदि समाचार पत्रों के माध्यम से विजयसिंह पथिक ने बिजौलिया किसान आंदोलन को समूचे भारत में चर्चा का विषय बना दिया।
  • मेवाड़ के प्रधानमंत्री सर जी. विजयराघवाचार्य के प्रयास से किसानों को पुनः भूमि दे दी गई और 1941 ई. में बिजौलिया आंदोलन का पटाक्षेप हो गया।
  • बिजौलिया किसान आंदोलन सर्वाधिक लंबे समय तक चलने वाला किसान आंदोलन था।
  • गांधीजी ने अपने सचिव महादेव देसाई को किसानों की समस्या का अध्ययन करने के लिए बिजौलिया भेजा।
  • बिजौलिया किसान आंदोलन का मुख्य ध्येय बिजौलिया के जागीरदार द्वारा किसानों पर लगाये भारी करों, विभिन्न लागतों तथा बेगार प्रथा के विरूद्ध अपना असंतोष व्यक्त कर न्याय प्राप्त करना था।