वैश्वीकरण का दौर है, और वैश्वीकरण वाली बातों का प्रचार-प्रसार हो तो बात समझ आती है
राष्ट्रीय स्तर पर कोई उल्लेखनीय कार्य किया गया है, तो उसका ढिंढोरा पूरे देश में अखबारों के माध्यम से करें तो भी समझ आए।
पर ये क्या, राज्य की सरकारें अपने कामों को दूसरे राज्यों में दैनिक अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापनों के माध्यम से दिखाती है। काम करेंगे चार आना दिखाएंगे बारह आना।






 









बात समझे से परे तो नहीं है किंतु आमजन के पैसों का स्पष्ट दुरूपयोग हो रहा है, और यह प्रतिस्पर्धा स्पष्ट देखी जा सकती है।
माना मुख्यमंत्री जी आपने अपने प्रदेश की जनता के लिए अच्छी योजनाएं चलाई है किंतु उनका लाभ वाकई जरूरतमंदों को मिला के नहीं, ये तो आपने जाना ही नहीं, अधिकारियों ने जो बताया उसे ही सच मान लिया।

विज्ञापनों के मायने

किसी भी राज्य में सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो, कार्य सभी करती है, योजनाएं सभी बनाती हैं, पर अधिकारी-कर्मचारी वर्ग उसे जनता तक कितना पहुंचा पाते हैं, यह बड़ी बात है।
जी, हर योजना, हर साल वर्षगांठ पर करोड़ों रुपये विज्ञापनों पर खर्च कर दिये जाते हैं।
चलो, ये विज्ञापन उस ही राज्य के दैनिक समाचार पत्रों तक सीमित रहे तो सही है, पर ये विज्ञापन तो दूसरे राज्यों की जनता तक पहुंच रहे हैं, आखिर क्या दिखाना चाहते हो। मुख्यमंत्री जी का राज्य की जनता का कार्य या पार्टी के कामकाजों का अप्रत्यक्ष रूप से बखान।
जी, सच तो यही है। सरकार कम, और पार्टी का प्रचार-प्रसार ज्यादा।
अजी, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान, तेलंगाना, आंध्रप्रेदश ...... राज्यों के विकास कार्य राजस्थान वालों के लिए किस काम के या राजस्थान में हो रहे विकास कार्य मध्यप्रदेश वालों के लिए किस काम के।
क्या, राज्य सरकार अपने स्टेट की स्कीम का लाभ अन्य राज्यों की जनता को भी देंगे, जो उन राज्यों में भी प्रचार किया जा रहा है।
ये तो सरासर पैसों की बर्बादी है।

मैं तो आमजन का गुमनाम चेहरा हूं, काफी समय से यही विश्लेषण कर रहा था कि आखिर एक राज्य की सरकार के कार्यों का प्रचार-प्रसार अन्य राज्य की जनता को दिखाने का क्या, तुक।

तुक कुछ नहीं, बस भ्रम फैलाना है कि हमारी पार्टी की सरकार उस राज्य में खूब विकास कार्य करवा रही है। आपके यहां भी हमारी पार्टी की सरकार बनाओ देखो हम आपके यहां भी विकास कार्यों की झड़ी लगा देंगे।

 

परंतु विकास तो खुद चलता है,
ऐसे ही जैसे अंग्रेजों के काल में शिक्षा के लिए निस्यंदन (अधोमुखी) सिद्धांत यानी डाउनवर्ड फिल्टरेशन थ्योरी शुरू कि गई थी जिसमें यह था कि अंग्रेजी शिक्षा उच्च वर्ग को दो तो वह धीरे-धीरे निम्न वर्ग तक पहुंच जाएगी।

ऐसे ही आज के दौर में विकास हो रहा है, पहले हजारपति हुआ करते थे, धीरे-धीरे लखपति बनें, और वर्तमान में तो हजार करोड़पति बन रहे हैं। अगर सच्चे मायनों में विकास होता तो, आज वाकई देश में गरीब नहीं होते। हां, विकास हो रहा है उनका जो पार्टी के चापलूस हैं।

जी, हां। हम किसी सरकार की बुराई नहीं कर रहे हैं बल्कि आमजन के पैसों का सदुपयोग की बात कर रहे हैं। आप स्वयं ही देख लीजिए, राज्य सरकारों ने किन-किन राज्यों में अपने विज्ञापन जारी किए हैं। 

विकास तो हर सरकार करेगी, पर विकास को बढ़ा चढ़ाकर दिखाने के लिए हर राज्यों के बीच होड़ाहोड़ मच रही है, और दूसरे राज्यों में भी विकास कार्यों का दिखावा किया जा रहा है।
 
 

जनता का पैसा
पार्टी के प्रचार-प्रसार में काम आ रहा
अब विकास विज्ञापनों में ही नजर आ रहा है।
एक राज्य की स्कीमों का शंखनाद
अब विज्ञापनों के माध्यम से
दूसरे राज्यों की जनता को दिखाया जा रहा है।