हिंदी का शेक्सपियर

  • हिन्दी साहित्य पुरेधा साहित्यकार रांगेय राघव को हिंदी का शेक्सपियर कहा जाता है, वे ही ऐसे साहित्यकार थे जिन्होंने हिंदी भाषियों को शेक्सपियर की रचनाओं से अवगत करवाया था। उन्होंने विलियम शेक्सपियर के 10 नाटकों का हिन्दी में हूबहू अनुवाद किया जो आज भी श्रेष्ठ अनुवादों में माने जाते हैं।
  • रांगेय राघव का निधन बहुत कम उम्र में हो गया था, लेकिन उन्होंने 39 वर्ष की छोटी सी उम्र में इतनी सारी साहित्यिक रचनाएं हिंदी साहित्य को दी है। जिनमें 38 उपन्यास हैं। 
  • उनका जन्म हिन्दी प्रदेश उत्तर प्रदेश में हुआ था लेकिन वह मूल रूप से तमिल भाषी थे, परंतु हिंदी में विशेष योग्यता हासिल की और अपना पूरा जीवन हिंदी साहित्य की सेवा में लगा दिया। उनके बारे में यह कहा जाता है कि वे दोनों हाथों से लिखा करते थे।   
  • रांगेय राघव का जन्म 17 जनवरी, 1923 को आगरा में हुआ था। उनका मूल नाम तिरुमल्लै नंबकम् वीरराघव आचार्य था, लेकिन उन्होंने अपना नाम साहित्य क्षेत्र में 'रांगेय राघव' नाम रखा। उन्होंने महज 13 साल की उम्र में लेखन कार्य शुरू कर दिया था।
  • वे हिंदी साहित्य के विलक्षण प्रतिभा थे, उन्होंने कहानी, उपन्यास, कहानी,रिपोतार्ज, कविता, आलोचना आदि स​हित हिंदी साहित्य की सभी विधाओं में लेखन कार्य किया। 

सिगरेट की आदत बनी मौत का कारण

  • रांगेय सिगरेट पीने के बहुत शौकीन थे, वह हमेशा 'जानपील' नाम की सिगरेट पीया करते थे, अन्य सिगरेट को वो हाथ तक नहीं लगाते थे। उनकी यही आदत उनके मौत का कारण बनी। 
  • 12 सितंबर, 1962 को मुंबई में रांगेय राघव का देहांत 39 वर्ष की अवस्था में हो गया था।

शै​क्षणिक योग्यता

  • उनके पिता रंगाचार्य और माता कनकवल्ली थी। उनकी शिक्षा-दीक्षा आगरा में संपन्न हुई थी। उनकी पढ़ाई आगरा में संपन्न हुई थी। उन्होंने वर्ष 1944 में सेंट जॉन्स कॉलेज से स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की। वर्ष 1949 में उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से गुरु गोरखनाथ पर शोध करके पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। इनकी शादी सुलोचना से हुई थी, जो जयपुर के राजस्थान विश्वविद्यालय में समाज शास्त्र की एसोसिएट प्रोफेसर रही।
  • उनका पहला मौलिक उपन्यास 'घरौंदा' था, जिसे उन्होंने महज 18 साल की उम्र में लिखा था, जो 23 साल की उम्र में प्रकाशित हुआ। 
  • उनकी पत्नी सुलोचना रांगेय राघव ने लिखा है 'वैसे पढ़ने में अच्छे थे, परंतु बी.ए. में अर्थशास्त्र में कम्पार्टमेंट आया। उनके पिता को इस असफलता का कारण बाद में पता चला, जब 'घरौंदा' तैयार हो गया। कॉलेज के प्रांगड में उगे पेड़ की छाया में बैठ, अर्थशास्त्र की क्लास में जाने की बजाय 'घरौंदा' लिखने में तल्लीन रहते। यह उनका पहला मौलिक उपन्यास है, जिसे उन्होंने 18 साल की आयु में लिखा था।'
  • उनकी हिंदी, अंग्रेजी, ब्रज और संस्कृत भाषाओं पर उनकी अच्छी पकड़ थी, साथ ही दक्षिण भारतीय भाषाओं तमिल और तेलुगू का भी उन्हें ज्ञान था।  

साहित्य के क्षेत्र में उपलब्धियां

  • जब उन्होंने लेखन कार्य शुरू किया था तब पूरे देश में आजादी के लिए संघर्ष जारी था, ऐसे में उनके लेखन में प्रगतिशील विचारों का समावेश मिलता है। वर्ष 1942 में उन्होंने बंगाल में पड़े अकाल की रिपोर्ट 'तूफानों के बीच' लिखी जो काफी चर्चित रही। 
  • रांगेय राघव ने जर्मन और फ्रांसीसी भाषाओं के कई साहित्यकारों की रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया। उनके द्वारा विलियम शेक्सपियर की रचनाओं का हिंदी अनुवाद किया। 

साहित्यिक रचनाएं

कहानी संग्रह

  • उनके द्वारा अनेक कहानियां लिखी गई, जिनमें प्रमुख हैं- देवदासी, समुद्र के फेन, जीवन के दाने, इंसान पैदा हुआ, पांच गधे, साम्राज्य का वैभव, अधूरी मूरत, ऐयाश मुर्दे, एक छोड़ एक, धर्म संकट, गदल आदि प्रमुख है।

उपन्यास

  • रागेय राघव ने घरौंदा (1946), मुर्दों का टीला (1948), कब तक पुकारूं (1957), हुजूर, रत्न की बात, राय और पर्बत, भारती का सपूत, विषाद मठ, सीधा-सादा रास्ता, लखिमा की आंखें, प्रतिदान, काका, अंधेरे के जुगनू (1953), लोई का ताना, उबाल, पराया, आंधी की नावें, धरती मेरा घर, अंधेरे की भूख, छोटी-सी बात, बोलते खंडहर, पक्षी और आकाश, बौने और घायल फूल, राह न रुकी, जब आवेगी काली घटा, पथ का पाप, कल्पना, प्रोफ़ेसर, दायरे, मेरी भाव बाधा हरो, पतझड़, धूनी का धुआं, यशोधरा जीत गई (1958), आखिरी आवाज़ (1962), देवकी का बेटा आदि प्रसिद्ध उपन्यास लिखे हैं।

  • उन्होंने आलोचना विधा में भारतीय पुनर्जागरण की भूमिका, संगम और संघर्ष, प्रगतिशील साहित्य के मानदंड, काव्यदर्श और प्रगति, भारतीय परंपरा और इतिहास, महाकाव्य विवेचन, समीक्षा और आदर्श, तुलसी का कला शिल्प, काव्य कला और शास्त्र, आधुनिक हिन्दी कविता में विषय और शैली, भारतीय संत परंपरा और समाज, आधुनिक हिन्दी कविताओं में प्रेम और श्रृंगार, गोरखनाथ और उनका युग आदि लिखी।
  • रांगेय राघव ने अनेक रिपोर्ताज लिखें जिनमें से 'तूफानों के बीच' काफी चर्चित रहा। उनके द्वारा रचित कविता संग्रहों में पिघलते पत्थर, श्यामला, अजेय, खंडहर, मेधावी, राह के दीपक, पांचाली, रूप छाया आदि प्रमुख है।


सम्मान और पुरस्कार

  • रांगेय राघव को उनकी रचनाओं के लिए उनके छोटे से जीवनकाल में कई पुरस्कार व सम्मान मिले। उन्हें वर्ष 1951 में हिन्दुस्तानी अकादमी पुरस्कार मिला। उन्हें डालमिया पुरस्कार, उत्तरप्रदेश शासन, राजस्थान साहित्य अकादमी सम्मान मिले हैं। उन्हें मरणोपरांत वर्ष 1966 में महात्मा गांधी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

मानवीय सरोकार के लेखक थे रांगेय राघव

  • रांगेय राघव ने अपनी रचनाओं की विषय वस्तु के रूप में आम जन जीवन का समूचा चित्रण किया है। वह लेखन के किसी वाद में नहीं बंधे। उन्होंने अपने ऊपर मढ़े जा रहे मार्क्सवाद, प्रगतिवाद और यथार्थवाद का विरोध किया। उनका कहना था कि उन्होंने न तो प्रयोगवाद और प्रगतिवाद का आश्रय लिया और न ही प्रगतिवाद के चोले में अपने को यांत्रिक बनाया। वह मूलतः मानवीय सरोकारों के लेखक हैं।
  • उनके साहित्य लेखन में मानवीय जीवन की दु:ख, दर्द, पीड़ा और उस चेतना की, जिसके भरोसे वह संघर्ष करता है, अंधकार से जूझता है, उसे ही सत्य माना, और उसी को आधार बनाकर उन्होंने लिखा। रांगेय राघव प्रेमचंद के बाद हिन्दी साहित्य के युग प्रवर्तक लेखक माने गए।

लैंगिक मतभेद पर की चोट

  • रांगेय राघव के सबसे चर्चित उपन्यास 'कब तक पुकारूं' और सबसे प्रसिद्ध कहानी 'गदल' का कथानक वर्ण व्यवस्था और लैंगिक मतभेद जैसी उत्पीड़क सामाजिक संरचनाओं के शिकार दो जन समुदायों के जीवन के इर्द-गिर्द घूमता है। 
  • कब तक पुकारूं में उन्होंने राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की करनट जाति के जनजीवन को केन्द्र में रखा है। इस आदिम जनजाति की जीवन-शैली, मूल्य मान्यताओं, इनके सतत उत्पीड़न और बदलते सामाजिक-राजनीतिक परिवेश के उन प्रभावों को रांगेय राघव ने इतनी गहराई और संबद्धता से चित्रित किया है कि यह उपन्यास, जिसके रोमांचक ऐतिहासिक आख्यान भर बन कर रह जाने या फिर आंचलिक जैसा कुछ बन जाने की पूरी संभावना थी, आधुनिक तथा वैज्ञानिक जीवन मूल्यों का उद्घोषक बन जाात है। 
  • उनकी स्त्री आधुनिक स्त्री के स्वतंत्रता के उद्घोष से स्वर मिलाते लगते हैं तो चंदा और नरेश के प्रसंग में तो उन्होंने अंतरजातीय प्रेम विवाह जैसे सवाल पर बेहद खुल कर बात की है और स्पष्ट पक्षधरता के साथ सामने आये हैं। 
  • एक प्रसंग में लेखक कहता है - 'यह बुराई नहीं है। यह जात-पात सब आदमी के बनाए बंधन हैं। दुनिया में एक मुल्क अमरीका है। वहां काले हब्शी रहते हैं। उन पर अत्याचार होता है, क्योंकि वहां के बाकी हुकूमत करने वाले लोग गोरे रंग के हैं .... बुरा धन है, धन की गुलामी बुरी है'
  • उन्होंने 'धरती मेरा घर' उपन्यास में गाड़िया लुहारों का वर्णन किया है। 

स्त्री और आमजन की पीड़ा के स्वर को प्रखर बनाया

  • रांगेय राघव के ऐतिहासिक उपन्यासों की खास बात यह है कि उनके अधिकतर ऐतिहासिक और चरित उपन्यास उन चरित्रों से जुड़ी महिलाओं के नाम पर लिख गए हैं। 
  • जैसे 'भारती का सपूत' जो भारतेंदु हरिश्चन्द्र की जीवनी पर आधारित है, 'लखिमा की आंखें' जो विद्यापति के जीवन पर आधारित है, 'मेरी भव बाधा रहो' कवि बिहारी के जीवन पर आधारित है, 'रत्ना की बात' जो तुलसी के जीवन पर आधारित है, 'लोई का ताना' जो कबीर-जीवन पर आधारित है, 'धूनी का धुआं' जो गारेखनाथ के जीवन पर कृति है, 'यशोधरा जीत गई' जो गौतम बुद्ध पर लिखा गया है, 'देवकी का बेटा' जो कृष्ण के जीवन पर आधारित है। 
निम्न में से कौनसा उपन्यास रांगेय राघव का नहीं है?
अ. विषाद-मठ
ब. मुर्दों का टीला
स. सीधा-सादा रास्ता
द. जल टूटता हुआ
उत्तर- द


हिन्दी साहित्य का शेक्सपियर किस कवि को कहा जाता है?
अ. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
ब. चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी'
स. रांगेय राघव
द. कमलेश्वर 
उत्तर- स
रांगेय राघव को हिन्दी साहित्य का शेक्सपियर कहा जाता है। 

रांगेय राघव को राजस्थान साहित्य अकादमी सम्मान किस वर्ष दिया गया?
- वर्ष 1961 में