झालरापाटन का सूर्य मंदिर

झालरापाटन का सूर्य मंदिर, कोणार्क और खजुराहो के मंदिरों से साम्यता रखता है अर्थात् यह मंदिर भी खजुराहो मंदिर शैली में निर्मित है।

इस मंदिर का निर्माण विक्रम संवत् 872 (9वीं सदी) में नागभट्ट द्वितीय ने करवाया। उत्कृष्ट तोरण द्वार से सजा मालवा के परमार राजाओं द्वारा निर्मित यह मंदिर अब विष्णु को समर्पित पद्मनाभ मंदिर या सात सहेलियों का मंदिर कहलाता है। गर्भग्रह में सूर्य की प्रथम रश्मियों की उपस्थिति दिव्य अनुभूति प्रदान करती है।


कर्नल जेम्स टॉड ने इसे चारभुजा मंदिर कहा है।
इस मंदिर के पृष्ठभाग में बनी सूर्य की मूर्ति घुटनों तक जूते पहने हुए हैं।

सूर्य मंदिर गलता जी जयपुर गलता पहाड़ी पर सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित दक्षिण मुखी मंदिर।

रणकपुर में प्राचीन सूर्य मंदिर सात घोड़ों से जुटे रथ में सूर्यनारायण की छवि युक्त सफेद संगमरमर का नागर शैली में बना मंदिर दीवारों पर योद्धाओं, घोड़ों, देवताओं की प्रतिमाएं कलात्मक रूप से उत्कीर्ण हैं।

बाड़मेर—जैसलमेर मार्ग पर देवका गांव में ऐतिहासिक सूर्य मंदिर पूर्व की ओर उन्मुख और अन्य प्राचीन मंदिरों का समूह स्थित है। इसका सभा मंडप और तोरण द्वार अत्यंत सुंदर हैं। यहां पर एक शिलालेख भी है।

चित्तौड़गढ़ का कालिका माता मंदिर राजा मानभंग द्वारा आठवीं शताब्दी में निर्मित सूर्य को समर्पित था मध्य काल में लगभग 14वीं शताब्दी में शाक्त मंदिर के रूप में परिवर्तित हो गया।

मंदेसर सूर्य मंदिर उदयपुर के मंदेसर में 10 वीं शताब्दी का नागर शैली में बना ऐतिहासिक सूर्य मंदिर है।

झुंझुनू के लोहार्गल पौराणिक महत्व का सूर्य मंदिर और सूर्य कुण्ड स्थित हैं। महाभारत युद्ध के पश्चात पांडवों ने यहां स्नान किया और सूर्य कुंड में हथियार गलाए थे। लोहार्गल का अर्थ यही है कि वह स्थान जहां लोहा गल जाए।

ओसियां में स्थित वैष्णव मंदिरों से कुछ ही दूरी पर सूर्य मंदिर है यहाँ सूर्य पुत्र रेवंत और शनि की मूर्तियां हैं। बुडादीत का सूर्य मंदिर कोटा में सुल्तानपुर के पास स्थित है, पूर्व की ओर उन्मुख सुंदर शिखर युक्त है।

रणकपुर में प्राचीन सूर्य मंदिर