देशी नस्ल पर विदेशी नस्ल के कुत्ते हावी


कितना कुछ बदल गया देश, हम गर्व करते हैं हिंदुस्तानी होने पर। पर ये क्या लोगों को हिंदुस्तान की नस्ल पसंद नहीं, जी मैं लोगों के शौक की बात कर रहा हूं जो विदेशी नस्ल के कुत्ते पालते हैं।


खैर मुझे क्या, मैं नहीं पालता कुत्ते, इतना जरूर है अपनी गली के कुत्तों के लिए हर दिन रोटी अवश्य डालता हूं, ताकि वे हमारी गलियों की सुरक्षा कर सके।


क्यों, प्रचलन बढ़ रहा है? 

देश में विदेशी नस्ल के कुत्तों का, कि लोग एक-दो नहीं, कई तो 5-7 विदेशी कुत्ते पालते हैं। सोचो ये बड़े दिल वाले हैं जो इनका खर्च वहन करने की क्षमता रखते हैं। वरना हमारे देश में तो मजदूर दो वक्त की रोटी नहीं जुटा पाते हैं। 


लोगों में कुत्ते पालने का प्रचलन क्यों बढ़ा है, क्या कारण है कि लोग देशी कुत्तों से ज्यादा विदेशी नस्ल के कुत्ते पाल रहे हैं?


कुछ लोगों के लिए यह व्यवसाय भी बन गया है।


हम भारतीय देशी कुत्ते नहीं पालते, बल्कि विदेशी नस्ल के कुत्ते पाल रहे हैं।


क्या देशी नस्ल के कुत्ते वफादार नहीं होते?

या फिर वे विदेशी नस्ल के कुत्तों की तरह सुन्दर नहीं होते हैं।


वे सुन्दर भी नहीं होते, शायद।


कभी लगता है अब नौकरों पर विश्वास नहीं किया जा सकता क्योंकि आए दिन ऐसी ही घटनाएं घटित हो रही है जिससे लोग नौकरों पर कम विश्वास करने लगे हैं।

अब नौकरों को सोचना होगा, कि आने वाले समय में वे मालिकों के विश्वासपात्र कतई नहीं होंगे। क्योंकि आने वाले समय में बेहद ईमानदार रो​बोट आ जाएंगे। 


वैसे कुत्तों ने भी सुरक्षाकर्मियों की स्थान ले लिया है।


क्या वाकई घर के सुरक्षाकर्मी अब विश्वास के पात्र नहीं रहे हैं जो इन विदेशी कुत्तों पर विश्वास बढ़ गया है।


ये हम सम्पूर्ण मानव जाति के लिए प्रश्न है कि मानव का मानव पर विश्वास कम हो रहा है, आखिर क्यों?


शायद, पैसा बड़ी चीज हो गई है जिसके पीछे सब भाग रहे हैं, जब मेहनताना कम हो और ज़िम्मेदारियां अधिक हो तो आदमी अंदर ही अंदर घुटने लगता है और वह अपने परिवार की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाता है।


इसी खींचातान में फिर वह नौकर अपने परिवार एवं खुद के सपनों को एक दिन में पूरा करने के लिए अपने मालिक के साथ धोखा, लूट, हत्या और अपहरण करने पर उतारू हो जाता है।


क्या, हम पहले की तरह नौकरों से परिवार के सदस्य की तरह व्यवहार नहीं करते हैं?


या नौकर ही परिवार का सदस्य नहीं बनना चाहता।


आज भौतिक आवश्यकता बहुत ज्यादा बढ़ गई है जिसे व्यक्ति को मिलने वाला मेहनताना पूरी नहीं कर पाता है और सबके पास हुनर नहीं है। जो अपना बिजनेस खड़ा कर सके।


माना पैसे बहुत सी जरूरतों को पूरी करता है, पर पैसों से मानवीय सेवा नहीं हो सकती।


हमें एक-दूजे पर पहले की तरह विश्वास जगाना होगा ताकि मानव-मानव के काम आ सके। हमें विदेशी कुत्तों की जगह देशी कुत्तों का पालतू बनाना होगा, ताकि उनका संरक्षण हो सके।


धन्यवाद

जय हिन्द।