कविता:
मुद्रा :
है नारी से भी ज्यादा कामुकता,
मादकता कुसुम कली से ज्यादा,
नशा शराब सा उसमें,
खनक उसमें पायल से ज्यादा,
तीव्रता उसमें बिजली जैसी,
तीक्ष्णता कटार से ज्यादा,
दर्द उसमें घाव से ज्यादा,
मर्ज है उसमें मरहम से ज्यादा,
ऐसी है उसकी अदा,
ऐसी है उसमें चंचलता,
वह मुद्रा है देश की,
कही रूपया, तो कही डॉलर,
कही यूरों, तो कही देशकाल में,
विभिन्न नामों से,
पुकारता है बुद्धिवादी जन,
सम्मान है उसका तात-मात् जैसा,
इन्हीं नामों ने आडम्बर रचा,
नर में भेद का स्वांग रचा,
नही साम्य मुद्रा में,
नस्लीय भेद का आधार बन,
श्रेष्ठता का दम्भ भर,
बौद्धिकवर्ग का अभिमान बनी,
मुद्रा बनी जीवन आधार,
जैसे श्वांस को समीर।
Rakesh Singh Rajput