उपेक्षित युवाशक्ति: कविता 
क्यूँ न उपजे,
मन में अवसाद?
युवा हूँ जाग्रत भारत का,
वर्तमान आबादी का,
प्रखर बुद्धिवादी हूँ।
कुंठित था पुराकाल से,
आधुनिक आबादी में,
उपेक्षित,हीन युवाशक्ति हूँ।
आजादी से पहले,
सोचा न होगा उन शहीदों ने,
मेरे स्वजन इतने घातक होंगे।
मेरे बाहुबल का तेज,
भूल गया भरत मानुषी,
गुलामी की बेडिय़ाँ किसने काटी?
पहरे बिठाये थे गौंरो ने,
आधुनिक शस्त्रास्त्रों के घेरे में।
हमारी पूँजी कुंठित थी,
फकीरी हालत में जननी रोती थी।
फिर भी वीरों को जन्मती थीं,
धराशायी हुआ,
वो शस्त्रास्त्रों का मंजर,
युवाशक्ति जब सरसाई थीं।
कितने नाम गिनाऊँ मैं?
कितनी कोखें उजड़ी थी?
कितनी के सिंदूर उजड़े थे?
वो विशाल उपनिवेशवाद,
पस्त हुआ युवा बाहुबल से।
तब क्यूँ हीन न समझा युवा को,
बताओं, ओ! भरत मानुषी?
अब मशीनी रक्षा सौदा कर,
आक्षेप युवाशक्ति पे लगाकर,
उपेक्षित युवा को करते।
लगा अब युवा बाहुबल कुंठित हैं,
हो मंथन युवाशक्ति का,
आक्षेप न लगे युवाशक्ति पे,
आये दिन की खबरों से,
अपराध के कालिख से,
स्वजननी को न लजाये।
भ्रम कैसा ये ओढ़ा,
रक्षा सौदा करोंड़ों का,
कुंठित करोड़ों बाहुबल हैं।
भ्रम देखों बुद्धिजीवी का,
शस्त्रीकरण नारा देते।
फिर भी करता सौदा शस्त्रों का।
अब तक महत्वाकांक्षाओं का समर,
सूना है बिन स्वजागृति के।
एक ही तो हैं जननी,
प्रकृति सदैव मौन रहती हैं।
चाह कर भी क्या जननी कहती हैं,
रौंदो न उस तन को,
नही शस्त्रास्त्रों की वेदी पर।
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राकेश सिंह राजपूत

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