जहां सुमति तहां सम्पत्ति नाना। 

जहां कुमति तहां विपत्ति निदाना।।

  • मानव जीवन बहुत चुनौतियों से भरा है। हर कदम पर बंधन है, धर्म, जाति व सम्प्रदाय या संस्थाओं का। 
  • लोग न धर्म को सच्चे अर्थों में स्वीकार करते हैं और न ही किसी सामाजिक बंधन को। बस जीना है खुद के लिए और बोलते हैं सॉरी सर मेरे कारण आपको तकलीफ उठानी पड़ी। पर ये तो वही मुंह में राम बगल में छुरी। कोई कहता क्या है और करता क्या है?
  • पर रामचरितमानस की उपरोक्त पंक्ति मानव को सच्चाई व्यक्त करती है कि यदि हम वास्तव में अपने जीवन में तरक्की करना चाहते हैं तो हमें अपने विवेक से सोचना चाहिए कि क्या सही है और क्या गलत?
  • यानि जिस व्यक्ति या परिवार के पास अच्छी सोच है उसकी उन्नति दिनोंदिन बढ़ती है और जहां पर संकुचित या नकारात्मक सोच के व्यक्ति या परिवार है उनके घरों में कलह आये दिन रहता है। ऐसे में उनकी उन्नति में वे खुद ही लड़कर बाधित करते हैं।
  • माना आज का मानव भौतिकता के चरमोत्कर्ष पर विराजमान है वह जो चाहे उसे पाने की क्षमता रखता है पर उसकी पहुंच कितने लोगों तक सम्भव है। शायद चंद लोगों तक क्योंकि बौद्धिक वर्ग हमेशा से ही श्रेष्ठ जीवन जीने में विश्वास रखता है। उसे आमजन से कोई वास्ता नहीं। हां, संवदेना जरूर व्यक्त करते हैं। पर वे समानता के लिए त्याग की नहीं सोचते हैं।
  • आज ये पंक्तियां उन लोगों के लिए नागवार सिद्ध हो सकती है जो विभिन्न धर्मों के व्यक्ति है किंतु इसके पीछे मेरा कोई ऐसा उद्देश्य नहीं कि मैं किसी अन्य धर्मों के लोगों को नीचा दिखाना चाहता हूं।
  • बल्कि ऐसी पंक्तियां अन्य धर्मों में होगी पर लोग उन पर अमल न कर केवल अपने निजी स्वार्थ व हक के लिए लड़ते हैं।
  • सबको पता है मानव जीवन का उद्देश्य और हमारे सामने प्रकृति ने हर तरह का संसाधन भरपूर मात्रा में प्रदान किया है पर महत्त्वाकांक्षा मानव हर बार उस पर अपना आधिपत्य जमा लेता है। 
  • हक जमाओं पर आप उसका सदुपयोग भी तो नहीं कर पाते हो, सब कुछ है पर दामों से सब कुछ को बांट दिया है और मिलावट से लोगों के साथ जानवरों का सा व्यवहार किया जा रहा है। जैसे - दाल खूब मात्रा में उपलब्ध है पर मिलावटखोर उसमें जरूर मिलावट करता है और पकड़े जाने पर अपना या तो सब कुछ खो देता है या फिर जानकारी से बच निकलता है। 
  • अरे भई जब पता है आपको सही माल के सही दाम मिल रहे हैं तो फिर मिलावट का प्रश्न ही कहां रह जाता है।
  • पर कुमति के चलते वे अपना ही नुकसान करा लेते हैं।
  • ऐसा ही आज के नेता, अधिकारी वर्ग और कुछ रिश्वत या ताकत (निजी स्वार्थ सर्वोपरि मानने वाले व्यक्ति लोभ देकर अपना काम करवा लेते हैं) के बल पर काम करवाने वालों का हश्रय हमने देखा है पर वे कब मानते हैं। 
  • हां, हर दिन अखबारों और मीडिया पर पढ़ा व देखा जाता है कि फलां नेता भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार या आज एक आईएएस या पटवारी या कलक्टर रिश्वत लेता रंगें हाथों पकड़ा गया।
  • हां, अभी आमजन बचा हुआ है रिश्वत देते रंगे हाथों पकड़ा वाली हैडिंग से पर कुछ नियम बनेंगे पर थोड़े देर से सही।
  • तो दोस्तों यही कहती है ये पंक्तियां कि इतने विद्वान होने के बाद व अच्छी सैलेरी होने के बाद भी लोगों की मति मारी जाती है। 
  • हां, जब पुलिस पूछती होगी या घर के सदस्य या पत्नी उनसे अकेले में मिलते होंगे तब जरूर कहते होंगे कि मेरी मति मारी गई, जो मैंने रिश्वत ली। अच्छा खासा जीवनयापन हो रहा था पर मैंने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली।
  • तो दोस्तों मानव जीवन में वे लोग भी ठगा जाते हैं जिनका सब कुछ अच्छा है पर अच्छी बुद्धि पर जब बुरी बुद्धि हावी हो जाती है। 
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