• हर संस्कृति की अपनी भौतिक संरचना भी होती है, जब पूजागृह के निर्माण का बिंदु हो, तो संस्कृति उसके कुछ विधान भी सुनिश्चित करती है, जो उसके वास्तु-शिल्प में परिलक्षित होती है। इस वास्तु-शिल्प में कुछ शास्त्रीय विधान होते हैं, जो कुछ दार्शनिक व्याख्या लिए हो सकते हैं, तो कुछ लोकसंस्कृति के रंग भी, जो वहाँ की परंपरा से प्राप्त हुए हों । इस प्रकार मंदिरों की संरचना अनुसार उनकी शैलियों को वर्गीकृत व परिभाषित करने का प्रयास किया गया है।  सामान्यतः प्रत्येक मंदिर में दो तरह की कक्षीय संरचना होती है-
  • गर्भगृह तथा मंडप, गर्भगृह में मुख्य देवता की मूर्ति स्थापित होती है। मन्दिर के गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा के लिये स्थान होता है। यह परिक्रमा पथ पूजन विधान के अतिरिक्त दर्शन हेतु आए श्रद्धालुओं को पंक्तिबद्ध या व्यवस्थित रूप में गमनागमन भी सुनिश्चित करता है।
  • गर्भगृह के ऊपर शिखर होता है, जो मंदिर की शैलियों के वर्गीकरण का प्रमुख निर्धारक है। शिखर व अधिष्ठान दोनों प्रायः जटिल ज्यामितीय संरचना के साथ बनाए जाते हैं। विशेषतरू नागर शैली के मंदिरों में शिखर में उपशिखर जुड़ते चले जाते हैं, जो अनंतता के प्रतीक माने जाते हैं। कई बार कलश के ऊपर ध्वज भी लगाए जाते हैं.
  • ऐसे ही एक मुख्य मंडप के अतिरिक्त लघु व अर्द्धमण्डप भी हो सकते हैं, जो दर्शन के अतिरिक्त कीर्तन, नर्तन आदि के लिए भी प्रयुक्त होते रहे हैं। सामान्यतः प्रथम मंडप सभामंडप (दर्शन हेतु) व द्वितीय मंडप रंगमंडप (कीर्तन, नर्तन हेतु) के रूप में प्रयुक्त होता था ।
  •  मंदिर निर्माण में मुख्यतरू पत्थर का प्रयोग होता रहा है, किंतु ईंटों के भी प्रचुर प्रयोग मिल जाते हैं । मौर्य काल में काष्ठ मंदिरों के भी साक्ष्य हैं । विशेषतया पहाड़ी क्षेत्र में काष्ठ मंडपों की अत्यधिक युति देखने को मिलती है । नेपाल के काठमांडू का नामकरण ही काष्ठ मंडप शब्द से हुआ है, जिसमें लकडी के साथ ईंटों का मंजुल समन्वय है ।


शैलियाँ-
  • भारतीय स्थापत्य कला व शिल्पशास्त्रों के अनुसार मंदिरों विशेषतरू हिंदू मंदिरों की तीन मुख्य शैलियाँ हैं-

नागर शैली : मुख्यत: उत्तर भारतीय शैली

द्रविड़ शैली : मुख्यत: दक्षिण भारतीय शैली

वेसर शैली रू नागर-द्रविड़ मिश्रित मुख्यतरू दक्षिण-पश्चिमी भारतीय शैली

पर यह वर्गीकरण भी बहुत स्थूल है। समय व संस्कृति भेद के साथ इनमें भी अनेक भेद व मिश्रण हैं । इनके अतिरिक्त हिमालय में हिमाचल, उत्तराखंड में अपनी पहाड़ी शैली प्रमुख है, तो पूर्वाेत्तर में बहुत अलग पूर्वाेत्तरीय शैली. इसी प्रकार राजस्थान में अनेक मध्यकालीन मंदिरों में राजपूताना शैली का प्राचुर्य या मिश्रण है, तो आधुनिक काल में ग्रीक-रोमन या यूरोपीय शैली का भी मिश्रण मिल जाता है।


नागर शैली-

  •             श्नागरश् शब्द नगर से बना है। सर्वप्रथम नगर में निर्माण होने के कारण इन्हे नागर की संज्ञा प्रदान की गई। नागर शैली की बहुलता मुख्यतः उत्तर व मध्य भारतीय परिक्षेत्र में है । नागर शैली का प्रसार हिमालय से लेकर विंध्य पर्वत माला तक विशेषतरू नर्मदा नदी के उत्तरी क्षेत्र तक देखा जा सकता है। यह कहीं-कहीं अपनी सीमाओं से आगे भी विस्तारित हो गयी है ।
  •             वास्तुशास्त्र के अनुसार नागर शैली के मंदिरों की पहचान आधार से लेकर सर्वाेच्च अंश तक इसका चतुष्कोण होना है । विकसित नागर मंदिरों में गर्भगृह, उसके समक्ष क्रमशः अन्तराल, मण्डप तथा अर्द्धमण्डप प्राप्त होते हैं। एक ही अक्ष पर एक दूसरे से संलग्न इन भागों का निर्माण किया जाता है।
  •                नागर वास्तुकला में वर्गाकार योजना के आरंभ होते ही दोनों कोनों पर कुछ उभरा हुआ भाग प्रकट हो जाता है जिसे श्अस्तश् कहते हैं। इसमें मूर्ति के गर्भगृह के ऊपर पर्वत-शृंग जैसे शिखर की प्रधानता पाई जाती है। कहीं चौड़ी समतल छत के ऊपर उठती हुई शिखा सी भी दिख सकती है। माना जाता है कि यह शिखर कला उत्तर भारत में सातवीं शताब्दी के पश्चात् अधिक विकसित हुई. कई मंदिरों में शिखर के स्वरूप में ही गर्भगृह तक को समाहित कर लिया गया है।


प्रमुख शिल्पशास्त्रों के अनुसार नागर शैली के मंदिरों के आठ प्रमुख अंग है -

अधिष्ठान    -     मूल आधार, जिस पर सम्पूर्ण भवन खड़ा किया जाता है।

शिखर       -    मंदिर का शीर्ष भाग अथवा गर्भगृह का उपरी भाग

कलश       -     शिखर का शीर्षभाग, जो कलश ही या कलशवत् होता है।

आमलक   -     शिखर के शीर्ष पर कलश के नीचे का वर्तुलाकार भाग

ग्रीवा         -     शिखर का ऊपरी ढलवाँ भाग

कपोत       -     किसी द्वार, खिड़की, दीवार या स्तंभ का ऊपरी छत से जुड़ा भाग, कोर्निस

मसूरक       -     नींव और दीवारों के बीच का भाग  

जंघा          -     दीवारें (विशेषकर गर्भगृह की दीवारें)

  •                परंतु ये आठ भी पूर्ण या पर्याप्त नहीं हैं. अधिष्ठान का ऊपरी प्लेटफार्म जगती कहलाता है। मूल मंदिर के शिखर के उपरांत एक अंतराल देकर स्तूपवत् मंडप भी बनते हैं। ये भी क्रमशरू घटती ऊँचाई व विस्तार के साथ महामंडप, मंडप, अर्धमंडप कहलाते हैं। द्वार व स्तंभ बहुधा सर्पाकृति आरोह अवरोह लिए बनने लगे, तोरण द्वार के रूप में. शिखर में जुड़ने वाले उपशिखर उरुशृंग कहे जाते हैं। शिखर को विमान भी कहा जाता है। मंदिर के विभिन्न स्थानों पर गवाक्ष भी दिख सकते हैं।


द्रविड़ शैली-
  •             यह शैली दक्षिण भारत में विकसित होने के कारण द्रविड़ शैली कहलाती है। तमिलनाडु के अधिकांश मंदिर इसी श्रेणी के हैं। इसमें मंदिर का आधार भाग वर्गाकार होता है तथा गर्भगृह के ऊपर का शिखर भाग प्रिज्मवत् या पिरामिडनुमा होता है, जिसमें क्षैतिज विभाजन लिए अनेक मंजिलें होती हैं। शिखर के शीर्ष भाग पर आमलक व कलश की जगह स्तूपिका होते हैं। इस शैली के मंदिरों की प्रमुख विशेषता यह है कि ये काफी ऊँचे तथा विशाल प्रांगण से घिरे होते हैं। प्रांगण में छोटे-बड़े अनेक मंदिर, कक्ष तथा जलकुण्ड होते हैं। परिसर में कल्याणी या पुष्करिणी के रूप में जलाशय होता है। प्रागंण का मुख्य प्रवेश द्वार श्गोपुरम्श् कहलाता है। प्रायः मंदिर प्रांगण में विशाल दीप स्तंभ व ध्वज स्तंभ का भी विधान होता है.


वेसर शैली-
  •             नागर और द्रविड़ शैली के मिश्रित रूप को वेसर शैली की संज्ञा दी गई है।  वेसर शब्द कन्नड़ भाषा के श्वेशरश् शब्द से बना है, जिसका अर्थ है- रूप. नवीन प्रकार की रूप-आकृति होने के कारण इसे वेशर शैली कहा गया, जो भाषांतर होने पर वेसर या बेसर बन गया.
  • यह विन्यास में द्रविड़ शैली का तथा रूप में नागर जैसा होता है। इस शैली के मंदिरों की संख्या सबसे कम है. इस शैली के मंदिर विन्ध्य पर्वतमाला से कृष्णा नदी के बीच निर्मित हैं। कर्नाटक व महाराष्ट्र इन मंदिरों के केंद्र माने जाते हैं। विशेषतरू राष्ट्रकूट, होयसल व चालुक्य वंशीय कतिपय मंदिर इसी शैली में हैं।
  •             उक्त शैलियों के सामान्य अंतर को हम इस तालिका व चित्र में भी देख सकते हैं।

  • मंदिरों की नागर व द्रविड शैलियों में सामान्य अन्तर


क्र.सं. नागर शैली द्रविड़ शैली

1 वर्गाकार आधार पर निर्मित आयताकार आधार पर निर्मित

2 शिखर की संरचना पर्वतश्रृंग के समान शिखर की संरचना प्रिज्म या पिरामिड के समान

3 शिखर के साथ उपशिखर की ऊर्ध्व-रैखिक परम्परा शिखर का क्षैतिज विभाजन और शिखर पर भी मूर्तियों की परम्परा

4 शिखर के शीर्ष भाग पर ऊर्ध्व-रैखिक आमलक एवं उसके ऊपर कलश शिखर के शीर्ष भाग पर कलश की जगह बेलनाकार व एक ओर से अर्धचंद्राकार संरचना एवं उसके ऊपर अनेक कलशवत् स्तूपिकाएं

5 शिखर सामान्यतः एक-मंजिले शिखर सामान्यतः बहु-मंजिले

6 गर्भगृह के सामने मण्डप व अर्द्धमण्डप गर्भगृह के सामने मण्डप आवश्यक नहीं, प्रायः शिखरविहीन मंडप, चावड़ी या चौलत्री के रूप में स्तंभ युक्त महाकक्ष

7 द्वार के रूप में सामान्यतः तोरण द्वार द्वार के रूप में सामान्यतः विशाल गोपुरम्

8 मंदिर का सामान्य परिसर मंदिर का विशाल प्रांगण

9 परिसर में जलाशय आवश्यक नहीं परिसर में कल्याणी या पुष्करिणी के रूप में जलाशय

10 मंदिर प्रांगण में पृथक दीप स्तंभ व ध्वज स्तंभ का भी विधान नहीं प्रायः मंदिर प्रांगण में विशाल दीप स्तंभ व ध्वज स्तंभ का भी विधान
  • 11 सामान्यतः द्रविड़ शैली की तुलना में कम ऊँचाई सामान्यतः नागऱ शैली की तुलना में अधिक ऊँचाई


मंदिरों संबंधी जानकारी के स्रोत-
  •  मंदिरों संबंधी जानकारी के स्रोत वही होते हैं, जो इतिहास ज्ञान के होते हैं। परंतु मंदिरों के संबंध में मिथक, आस्थाएँ, किंवदंतियाँ, जनश्रुतियाँ भी पर्याप्त प्रभावशाली हो जाती हैं। सामान्यतरू अभिलेखों के रूप में शिलालेखों व ग्रंथों के अतिरिक्त दानपत्रों, ताम्रपत्रों, बहियों, रोजनामचों व शासकीय पट्टों या राजाज्ञाओं से तो जानकारी मिलती ही है, राजस्थान में कहीं वातों, ख्यातों, वंशावलियों व वचनिकाओं में भी पर्याप्त जानकारी मिल जाती है।


राजस्थान के मंदिरों की शैली-

           
  • राजस्थान में लगभग प्रत्येक शैली के मंदिर मिल जाते हैं। उनमें अनेक राजपूताना की अपनी शैली में भी निर्मित हैं। बाहुल्य नागर व नागरपरक राजपूताना शैली के मंदिरों का है. अनेक मंदिर पुरातात्विक महत्व के हैं, जो भारतीय पुरातत्व विभाग या राज्य पुरातत्व विभाग के अंतर्गत अधिसूचित हैं। यहाँ जयपुर के विराटनगर (वैराठ) में बीजक की पहाड़ियों में मौर्यकालीन मंदिर के अवशेष भी मिले हैं, जो भारत के सर्वाधिक प्राचीन मंदिरों के अवशेषों में परिगणित है. दौसा जिले के बरनाला गाँव में प्राप्त शिलालेख अनुसार वहाँ तीसरी सदी के मंदिर होने के भी तर्क हैं ।

                
  • अनेक मंदिरों में शैली का ऐसा व्यामिश्रण है कि उन्हें किसी शास्त्रीय वर्गीकरण में समाहित करना कठिन है। उदाहरणार्थ डूँगरपुर का देवसोमनाथ मंदिर नागर शैली का होकर भी द्रविड़ शैली की तरह बहुमंजिला है. रणकपुर मंदिर में शिखरों की बहुलित शृंखला है. ऐसे ही अनेक मंदिर गोल गुंबदाकार हैं, जिनपर मुगल व यूरोपीय शैली की छाप है । अपनी सुंदर आंतरिक नक्काशी के लिए प्रसिद्ध माउंट आबू के देलवाड़ा जैन मंदिर का मुख्य मंदिर विमल वसाहि शिखर से इतना साधारण है कि उसे किसी शैली में रखना कठिन है, जबकि इसी के प्रारंभ में खरतरगच्छ मंदिर का शिखर बहुत कुछ वेसर शैली सा दिखता है। ऐसी विविधता अन्यत्र भी बहुत है।