अपवादों का साया है जीवन,
इक अपवाद मैं बताता हूं।
जीवन डोर संभाल प्रकृति,
मानव जीवन प्रबुद्ध बनाती है।।
अभिलाषा जीवन जीने की,
किसे नहीं, आज हमें बतलाती है।
सकल सृष्टि में जीतो स्व को,
यही हमें सीखलाती है।।
यह इक कवि कल्पित रचना है,
सिर्फ कलम लिख पाती है।
कह तो हम भी नहीं पाते मुसाफिर,
दर्द भरी कहानी है।।
जीता हूं सिर्फ स्व मतलब को,
मजहब नहीं सीखाता है।
औरों का दोष क्या बता दूं मुसाफिर,
अपवादों का साया हम ही है।।
स्वार्थ से भरा है जीवन सबका,
पर क्या सकल सृष्टि से ज्यादा।
वो चाहत रखती है जीने की मुसाफिर,
प्रेमी युगल से ज्यादा।।
सुन्दर आंगन महकता है स्व का,
उपवन में जैसे कुसुम खिले हो।
मेरा भी आंचल भर दो मुसाफिर,
प्रकृति मन सरस प्रेम का प्यासा।।
कभी उद्भूत नहीं हुआ मन से,
नर प्रकृति का अकेला भोक्ता है।
प्रकृति सृष्टि को देख मुसाफिर,
मधुर सरस विलासी है।।

स्वीकार करो, धरती हमारी जननी है।
- राकेश सिंह राजपूत