श्री हरिः
  • सांसारिक मोह के कारण ही मनुष्य ‘मैं क्या करूं और क्या नहीं करूं’ इस दुविधा में फंसकर कर्त्तव्यच्युत हो जाता है। अतः मोह या सुखासक्ति के वशीभूत नहीं होना चाहिये।
  • शरीर नाशवान् है और उसे जानने वाला शरीरी अविनाशी है, इस विवेक को महत्त्व देना और अपने कर्त्तव्य का पालन करना - इन दोनों में से किसी भी एक उपाय को काम में लाने से चिन्ता-शोक मिट जाते हैं।
  • निष्काम भावपूर्वक केवल दूसरों के हित के लिए अपने कर्त्तव्य का तत्परता से पालन करने मात्र से कल्याण हो जाता है।
  • कर्म बन्धन से छूटने के दो उपाय हैं - कर्मों के तत्त्व को जानकर निःस्वार्थ भाव से कर्म करना और तत्त्व ज्ञान का अनुभव करना।
  • मुनष्य को अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों के आने पर सुखी-दुःखी नहीं होना चाहिए, क्योंकि इनसे सुखी-दुःखी होने वाला मनुष्य संसार से ऊंचा उठकर परम आनन्द का अनुभव नहीं कर सकता।
  • किसी भी साधन से अन्तःकरण में समता आनी चाहिये। समता आये बिना मनुष्य सर्वथा निर्विकार नहीं हो सकता।
  • सब कुछ भगवान ही है - ऐसा स्वीकार कर लेना सर्वश्रेष्ठ साधन है।
  • अन्तकालीन चिन्तन के अनुसार ही जीव की गति होती है। अतः मनुष्य को हरदम भगवान् का स्मरण करते हुए अपने कर्त्तव्य का पालन करना चाहिये, जिससे अन्तकाल में भगवान् की स्मृति बनी रहे।
  • सभी मनुष्य भगवत्प्राप्ति के अधिकारी हैं, चाहे वे किसी भी वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय, देश, वेश आदि के क्यों न हों!
  • जगत में जहां भी विलक्षणता, विशेषता, सुन्दरता, महत्ता, विद्वत्ता, बलवत्ता आदि दिखे उसको भगवान् का ही मानकर भगवान् का ही चिन्तन करना चाहिए।
  • इस जगत को भगवान का ही स्वरूप मानकर प्रत्येक मनुष्य भगवान् के विराट स्वरूप के दर्शन कर सकता है।
  • जो भक्त शरीर-इन्द्रियां-मन बुद्धि सहित अपने-आपको भगवान् के अर्पण कर देता है, वह भगवान् को प्रिय होता है।
  • संसार में एक परमात्म तत्त्व ही जानने योग्य है। उसको जानने पर अमरता को प्राप्ति हो जाती है।
  • संसार बंधन से छूटने के लिए सत्व, रज और तम - इन तीनों गुणों से अतीत होना जरूरी है। अनन्य भक्ति से मनुष्य इन तीनों गुणों से अतीत हो जाता है।
  • इस संसार का मूल आधार और अत्यन्त श्रेष्ठ परमपुरुष एक परमात्मा ही हैं, ऐसा मानकर अनन्य भाव से उनका भजन करना चाहिए।
  • दुर्गुण-दुराचारों से ही मनुष्य चौरासी लाख योनियों एवं नरकों में जाता है और दुःख पाता है। अतः जन्म-मरण के चक्र से छूटने के लिए दुर्गुण-दुराचारों का त्याग करना आवश्यक है।
  • मनुष्य श्रद्धापूर्वक जो भी शुभ कार्य करे, उसको भगवान् का स्मरण करके, उनके नाम का उच्चारण करके ही आरम्भ करना चाहिए।
  • सब ग्रन्थों का सार वेद हैं, उपनिषदों का सार गीता है और गीता का सार भगवान् की शरणागति है। जो अनन्य भाव से भगवान् की शरण हो जाता है, उसे भगवान् सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर देते हैं।