कब वक्त बदल जाता है कोई नही जानता ऐसा ही हुआ है इस शक्स के साथ। कभी नही सोचा होगा लेकिन विधाता को न जाने क्या मंजूर था कि जिन्दगी उस दिन के बाद नरक में बदल गई, जी हां ऐसा ही घटित हुआ श्रीमान देवीसिंह राजपूत के साथ, जो सवाई माधोपुर ज़िले की गंगापुर सिटी के गांव खूंटला के निवासी है। पहले तो बेरोजगारी ने दर-दर की ठोकर खाने के लिए मजबूर किया और जब सरकारी नौकरी न मिली तो जैसे-तैसे भारत की टेलीकॉम कंपनी भारती एयरटेल में टेक्नीशियन की प्राइवेट नौकरी मिली और  सोचा शायद जीवन सुखपूर्वक व्यतीत हो जायेगा, उसके बाद उनकी इस सेवा के बाद उन्हें सुपरवाइजर की पोस्ट पर दौसा जिले में पदस्थापित किया।

दौसा में  नौकरी करते समय 12 जून 2013 को जब वे नौकरी से घर लौट रहे थे कि उनका एक मोटरसाइकिल सवार ने ओवरटेक के दौरान टक्कर मार दी। इस दौरान उनके बांये पैर में फैक्चर हो गया जिसके ईलाज के लिए जयपुर के खण्डाका अस्पताल में भर्ती कर दिया, जिसके दौरान दूसरे दिन ऑपरेशन के पूर्व बेहोशी के इंजेक्शन लगाने के बाद उनकी आंखों के सामने अंधेरा होने लगा तथा सांस लेने में तकलीफ होने की शिकायत की तो अस्पताल प्रशासन में हडकंप मच गई और उन्हें तुरंत एसएमएस अस्पताल के लिए रैफर कर दिया, जहां से कई अस्पताल में ले गए पर किसने गंभीर हालत को देख मना कर दिया, ऐसे में फोर्टीस अस्पताल में सिर्फ इस शर्त पर कि हम इलाज तो कर सकते है पर ईलाज मंहगा होगा, इस दौरान उनके बडे भाई सुरेश सिंह ने ऐसे हालातों हिम्मत नही हारी और जो ईलाज का खर्च था वहन के लिए तैयार हो गये।
                                                   
                 देवीसिंह राजपूत की वर्तमान स्थिति

कहते आदमी का व्यवहार बडा होता है ओर वक्त पडे आडे आता है ऐसा ही हुआ उनके साथ लगभग एक माह तकउनको चाहने वालों की लाइन लगी रहती थी, वे कब स्वस्थ्य हो किंतु वे कौमा में जा चुके थे।अस्पताल वालों ने कोई रहम नही दिखाई उन्हें सिर्फ पैसों से मतलब था, यदि पैसे है तो ईलाज है नही तो बाहर। जब तक संभव था पैसें खर्च किये और जब शक्ति नही रही मरीज को घर ले गए, वे तक अस्पताल को लगभग 12-15 लाख रूपये दे चुके थे।

स्थिति ज्यादा अच्छी नही थी फिर भी ईलाज करवाया गया।जिस कंपनी का मुनाफा दो सौ-तीन सौ करोड सालाना हो और वह भी उन के बूते पर जो अपने फर्ज के लिए न रात देखते है और न ही दिन। घरवाले कहते है ऐसी नौकरी से तो घर बैठें रहे वही अच्छा है शायद यह बात मानी होती तो ऐसा दिन नही देखना पडता। कंपनी ने कोई आर्थिक सहयोग नही दिया। ऐसा क्यूं ?

जो व्यक्ति कंपनी के लिए इतना कुछ करते है उनके जीवन की सुरक्षा की जिम्मेदारी उस कम्पनी की भी बनती है। वह यह क्यूं भूल जाता है कि उनके परिवार के कितने सदस्य है। यदि उसे कुछ हो गया तो उस परिवार पर क्या आपदा आन पडेंगी।

यही हुआ इस शक्स के साथ एक पत्नी, चार लडकियां और सबसे छोटा एक लडका जो शायद अपने भविष्य को लेकर बिल्कुल अबोध। यही नही उनके साथ विधाता ने अन्याय पूर्व में ही कर दिया, एक पुत्री को मनोरोगी, मिर्गी का रोग और मंदबुद्धि जन्मजात दिया। ऐसा नही अभावों में भी इस बच्ची का जिस किसी ने भी जो डॉक्टर बताया उससे इलाज करवाया लेकिन उसके कोई सुधार नही हुआ, पर उसने हिम्मत नही हारी, ऐसा था उस पिता का अपनी इस बेटी के प्रति प्यार। जब कभी पुत्री नंदनी दिखती तो यह पिता उसे गोद में उठाकर फूले न समाता था और बेटी शायद को खुद को सबसे भाग्यशाली समझती थी, किंतु इसे विधाता का या कुदरत का कहर या उस बच्ची की बदनसीबी या उस औरत का दुर्भाग्य या उस पिता व भाई का दुर्भाग्य कहें।  जो भी हो , एक हंसता खेलता परिवार बिखर गया।
मानसिक विकार से ग्रस्त नंदनी



                          नंदनी और उसकी माँ

जिस कंपनी ने ही सिर्फ पेट पालने वाले वेतन ही देना उचित समझा हो वह व्यक्ति कैसे अपना ईलाज करवा सकता है। वह तो उनके बड़े भाई, परिवार, दोस्त और रिश्तेदारों के सहयोग से इतनी राशि खर्च की है। अन्यथा वह कब का ही दम तोड चुका होता।