केमिकल से पके फल


अक्सर हम ऋतु के अनुसार फल खाते हैं तो वह हमारी सेहत के लिए बहुत सही है, लेकिन कई बार कुछ फल समय से पहले ही बाजार में उपलब्ध होते हैं जबकि उनके पकने का समय अभी नहीं हुआ फिर भी बाजार में उपलब्ध है। ये सब रसायनों का कमाल है। हमें फलों को अच्छे से गुनगने पानी में धोकर खाना चाहिए, ताकि केमिकल या अन्य नुकसानदायक तत्व साफ हो जाए। 


फलों का पकना एक प्राकृतिक प्रक्रिया होती है, जिसमें फल ज्यादा मीठे, कम हरे, मुलायम और स्वाद में अच्छे होते हैं। यह प्रक्रिया पेड़ों की डाली पर ही होती है, लेकिन ज्यादा मुनाफा कमाने और दूर दराज में पके फलों को भेजने में बहुत नुकसान होता है, इस वजह से उनका भंडारण करके पकाया जाता है। 


भंडारण के दौरान प्राकृतिक तरीके से पकने की प्रक्रिया धीमी होती है। पकने के लिए किए गए भंडारण के दौरान इनकी रासायनिक और एंजाइम संरचना में बदलाव होता है। पकने की इस प्रक्रिया में एंजाइम टूटते हैं साथ ही स्टार्च जैसे पॉलीसैचराइड्स हाइड्रोलिसिस प्रक्रिया से गुजरते हैं। यह प्रक्रिया स्टार्च को फ्रक्टोज, ग्लूकोज, सुक्रोज जैसे छोटे अणुओं में तोड़ देती है।


पकाने की कृत्रिम प्रक्रिया


इथाईलीन और एसिटीलीन जैसे असंतृप्त हाइड्रो कार्बन फलों को तेजी से पकाते हैं। हालांकि इस प्रक्रिया में फल का इंद्रिय ग्राही स्वरूप जैसे स्वाद, महक, देखने में आकर्षक आदि काफी हद तक चौपट हो जाते हैं।


शीघ्रता से पकाने के लिए कारोबारी कम समय वाले फलों में भी जरूरत से ज्यादा रसायन डाल देते हैं जो इंसानी इस्तेमाल के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकता है। आजकल फलों को पकाने के लिए बाजार में तमाम रसायन मौजूद हैं। इनमें कैल्शियम कार्बाइड, कार्बन मोनॉक्साइड, पोटैशियम सल्फेट, इथीफोन, पोटैशियम डाई हाइड्रोजन आर्थोफास्फेट, पुट्रेसिन, ऑक्सीटोसिन, फोटोपोरफायरिनोजेन आदि हैं।


खतरनाक है कैल्शियम कार्बाइड रसायन


इसे आमतौर पर ‘मसाला’ नाम से जाना जाता है। फलों को पकाने में सर्वाधिक इसी का इस्तेमाल होता है। कई देशों में

इसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध है। शुद्ध रूप में ये रंगहीन होता है, लेकिन अन्य रूपों में यह काले, सफेद-भूरे रंग का होता है। लहसुन की तरह इसकी महक होती है। पानी (नमी) के साथ मिलकर यह एसिटिलीन गैस बनाता है, जो फलों को तेजी से पकाती है। 

आम, केला, पपीता, खुबानी और आलूबुखारे को बहुतायत में इसी से पकाया जाता है।


क्या है कानूनी प्रावधान


खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियमों 2011 के अनुसार कोई भी व्यक्ति कार्बाइड

से कृत्रिम रूप से पकाए गए फलों को नहीं बेच सकता है। कानून की धारा

50 के अनुसार, अगर तय मानकों पर किसी विक्रेता के फल खरे नहीं उतरते

तो उस पर पांच लाख तक जुर्माना लगाया जा सकता है। इसी कानून की

धारा 59 में ऐसा करने वालों के लिए सजा का भी प्रावधान है। अगर किसी

को ऐसा करता कोई व्यक्ति मिल जाए तो उसकी शिकायत राज्य के फूड

सेफ्टी कमिश्नर के यहां की जा सकती है।


कैल्श्यिम कार्बाइड के नुकसान


इसमें घातक और खतरनाक रसायन आर्सेनिक व फास्फोरस हाइड्राइड होते हैं। जो लोगों पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।

इससे पके फल खाने से पेट खराब रहता है। आंतों की कार्यशैली गड़बड़ाती है।

इन तत्वों के चलते खून और ऊतकों में कम ऑक्सीजन पहुंचती है जो हमारे तंत्रिका तंत्र पर असर डालता है।


ध्यान रखने योग्य बातें


बाजार से कृत्रिम रूप से पके फलों को खरीदें नहीं, यदि खरीद लिया है तो इस्तेमाल से पहले फल को अच्छी तरह से धोएं।

आम और सेब जैसे फलों को साबूत न खाएं बल्कि काटकर खाएं।

जितना संभव हो, उपभोग से पहले फल को छीलें।


ऐसे करें फलों के पकने की पहचान


प्राकृतिक रूप से पके फल


आकर्षक होगा, लेकिन पूरे फल का रंग एक समान नहीं होगा।

फल का वजन ज्यादा होगा

महक अच्छी होगी, सुदृढ़ और चटख होगी। 

स्वाद मीठा, ज्यादा दिनों तक खराब नहीं होगा।


केमिकल से पके फलों में स्वाद नहीं होता


फल खाते समय स्वाद का भी ध्यान रखें ताकि आप प्राकृतिक रूप से या कृत्रिम रूप से पके फलों की पहचान कर सकते हैं। 

पूरे फल का एक जैसा रंग होता है, लेकिन आकर्षक नहीं दिखता

महक कम और फल सुदृढ़ दिखेगा।

फल पका दिखेगा, फिर भी आंतरिक हिस्सों में खट्टापन रहेगा।

छिलके का जीवनकाल लंबा नहीं होगा। दो या तीन दिन में ही काले धब्बे दिखने लगेंगे।

जो फल केमिकल से पकाए जाते हैं उनके स्वाद में फर्क आ जाता है। ऐसे में कोई फल खा रहे हैं और उसके स्वाद को लेकर किसी तरह की आशंका हो तो उसे न खाएं। 

फलों को खाने से पहले उनको हल्के गुनगुने पानी में डूबो कर साफ कर लें। ताकि फलों की ऊपरी सतह पर लगी मोम या केमिकल की परत खत्म हो जाए।

केला आधा कच्चा या उसकी भीतरी परत बहुत अधिक ठोस है या उसमें कसावट जैसा स्वाद आ रहा है तो खाने से परहेज करें।


टैगपोन-39 रसायन जानलेवा


फलों के साथ सब्जियों की पैदावार बढ़ाने के लिए टैगपोन-39 रसायन का प्रयोग होता है। सबसे अधिक इस्तेमाल खीरा, टमाटर, आम और कॉफी के पौधों में होता है जिससे पौधे का विकास जल्दी शुरू होता है। फल-सब्जी जल्दी आने लगते हैं। कच्चे फलों और सब्जियों को टैगपोन-39 केमिकल से भरे बड़े टबों में डूबोकर छोड़ देते हैं। इस प्रक्रिया के 24 घंटे के भीतर फल पक जाता है। इससे तैयार फल या सब्जी को खाने से आंत, पेट, त्वचा संबंधी, किडनी और लिवर के साथ कैंसर जैसी घातक बीमारियों का खतरा रहता है।


इस प्रकार आप ऋतु से पहले फलों का स्वाद लेने से बचें और सेहत को तंदुरुस्त रखें।