Theva Kala kahan ki prasiddha hai

  • राजस्थान का प्रतापगढ़ (Pratapgarh) जिला थेवा कला के कारण में अपनी विशिष्ट स्थान रखता है। इस कला में विभिन्न रंगों के कांच पर सोने की मीनाकारी की जाती है, जिसे थेवा कला कहते हैं।
  • इस कला में पहले कांच पर सोने की बहुत पतली वर्क लगाकर उस पर बारीक जाली बनाई जाती है, जिसे थारणा (Tharana) कहा जाता है। फिर कांच को कसने के लिए चांदी के बारीक तार से फ्रेम बनाया जाता है, जिसे वाडा कहते हैं। इसके बाद इसे तेज आग में तपाया जाता है, जिससे शीशे पर सोने की कलाति उभर जाती है। थेवा कला में आभूषणों के अलावा सजावटी सामान भी बनाए जाते हैं।
  • थेवा आभूषण बनाने वाले स्वर्णकारों में सुप्रसिद्ध शिल्पकार श्री नाथू सोनी के परिवार को प्रतापगढ़ के ततत्कालीन शासक सामंत सिंहन ने राजसोनी की उपाधि प्रदान की थी, इसलिए आज भी इन परिवारों को राजसोनी कहा जाता है।
  • इस कला में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए प्रतापगढ़ के श्री महेश राजसोी को पद्मश्री प्रदान किया गया।
  • थेवा कला पर नवम्बर, 2002 में 5 रुपये का डाक टिकट जारी किया गया।
  • राजस्थान थेवा कला संस्थान प्रतापगढ़ को जीआई टेग प्रमाण पत्र भी मिल चुका है।
  • थेवा कला का उल्लेख इनसाइक्लोपीडिया ऑफ ब्रिटेनिका में भी किया गया है।