• इतिहास साक्षी है जो अपनी मेहनत से कोई मुकाम पा लेता है उसे वह त्यागता नहीं है, फिर चाहे उसके इस व्यवहार से एवं उसे बनाकर रखने में कितने ही लोगों को कष्ट उठाना पड़े, कितने ही लोगों का शोषण हो, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है। क्योंकि हमेशा ही एक वर्ग ऐसे लोगों का हितैषी होता है, जो उनकी आढ़ में अपनी बेहतर आजीविका का स्रोत बना लेते हैं। 
  • सच ही कहा है
  • कितना कष्ट उठाना पड़ा नेपोलियन बोनापार्ट को सत्ता को काबू में रखने के लिए। उसने तो यहां तक कह दिया कि 'सत्ता मेरी रखैल है। इसे वश में करने के लिए मुझे इतनी दिक्कत उठानी पड़ी है कि मैं न तो उसे किसी और को छीनने दूंगा और न अपने साथ भोगने दूंगा।'
  • यही रहा है हर देश के राजतंत्र, लोकतंत्र, साम्यवाद, समाजवाद सभी व्यवस्थाओं में। ज्यों-ज्यों समय व्यतीत होता है इन व्यवस्थाओं में रूढ़ियां पनपने लगती है। 
  • अब देख लीजिए हमारे देश में ही, राजतंत्र को गुजरे करीब 80 साल हो गए। इन सालों में हर वर्ग में करोड़ों लोग करोड़पति बना गए, फिर भी लोग आज भी शो​षण आदि के लिए पूर्वजों को कोसते हैं। 
  • अरे, भाई आज सत्ता के लोभी आमजन का लड़ा रहे हैं। जातिवाद और धर्म के नाम पर। कहते हैं पहले ताकतवर और बुद्धिवादी लोग मिलकर आमजन का शोषण करते थे, अब पैसेवाले और बुद्धिवादी जन मिलकर लोगों को शोषण कर रहे हैं। 


  • अब प्रश्न जाति वाला नहीं रहा है, इसे तो बनाया जा रहा है।
  • अब मुद्दा आरक्षण समाप्त करने का नहीं है उसे सही तरीके से लागू का होना चाहिए, किंतु सत्ता के लोभी उसे उलझा रहे हैं। 
  • आज लोकतंत्र में आधुनिक राजतंत्र की बू आ रही है, क्योंकि कोई विरासत में मिल सत्ता को कैसे त्याग दें। 
  • यकीनन आज स्वार्थी लोग अपने निजी स्वार्थों के लिए सत्ता का त्याग नहीं करते हैं। 
  • अब अधिकारीगण और हाई प्रोफाइल वर्ग मिलकर लोगों का खूब शोषण कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें सरकार द्वारा दी गई तनख्वाह, अन्य सुविधाएं पूर्णिमा का चांद प्रतीत हो रही है। 
  • होगी क्यूं नहीं, साहब को रॉयल अंदाज पसंद।


साहब को रॉयल अंदाज पसंद।

अधिकारीगण है लेते संविधान की शपथ है

पर कुछ साहब की तिरक्षी नजर है,

साहब को...


सरकार बातें जनकल्याण की करती है

पर लागू तो उसे अधिकारीगण करते हैं

उन्हें लगता है खजाना तो हमारा है

कैसे गरीबों का हक दें

बिना रिश्वत के अपना धन दें

तभी डिमांड रिश्वत की बढ़ी है

साहब को...


कभी-कभी तो रिश्वत अस्मत मांग लेते हैं

दोष सिस्टम का नहीं

पुरुषवादी सोच ही ऐसी है

क्या राजतंत्र, क्या लोकतंत्र

सब नरों में ही जिस्म की भूख है

जिसे देखो वही रंगरैलियां कर रहा

हर और अर्धनग्नता परोसी जा रही है

ऐसे में...ऐसे में

साहब को...


आज भी कुछ तो बारों में जाम छलकाते हैं

आज भी अपनों के काम बनाते हैं

विवश आमजन से पहले उनके काम बनाते हैं

आमजन बेचारे आज भी लाचार नजर आते हैं

बात वही उनके पास इतने पैसे कहां

रिश्वत से लोकतंत्र का बेड़ा गर्क हो रहा 

साहब को...

जो रिश्वत देता है उसके काम तुरंत बनते हैं

कुछ साहब को रॉयल अंदाज पसंद।


  • करीब-करीब हर अधिकारी और हाई प्रोफाइल लाइफ जीने वाला व्यक्ति यही कहता है उसने बहुत इंवेस्ट किया है अपने करियर बनाने में, तो वह तो उसे वसूल करेगा ही। 
  • अरे, भाई कोई अपना घर उजाड़ने थोड़े बैठा है। 
  • कोई नहीं लूटता अपना धन धर्म वालों के लिए, न ही जाति वालों के लिए, यही नहीं कई-कई तो अपने भाई-बंधुओं तक के लिए एक फूटी कोड़ी तक सहयोग में नहीं देते हैं। 
  • आज बहुत से नेता गांधीजी को अपना आदर्श मानते हैं, मगर वे वहीं सबसे ज्यादा भ्रष्ट होते हैं, ये बात अलग हो कुछ लोग कम भ्रष्ट हो सकते हैं, कुछ पूरे ईमानदार हो सकते हैं। लेकिन ये ईमानदार अपनी पार्टी के बेइमान लोगों के खिलाफ कुछ नहीं कहते। 
  • दूध में गिरी मक्खी को भी ये भी उनके संग निगल जाते हैं, क्योंकि सत्ता में जो रहना है।  
  • अरे, भाई मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं, एक नेता जीतनी सम्पत्ति चुनाव लड़ने में खर्च करता है वह अपनी सरकार द्वारा निर्धारित आय से कतई अर्जित नहीं कर सकता।
  • फिर यदि पार्टी चुनाव के लिए पैसा देती है तो पार्टी के पास पैसा कहां से आया। 
  • चंदा से पैसा लिया तो फिर आपको चंदा देने वाले के हितों को साधना पड़ेगा। उन्हें कुछ तो फायदा पहुंचाना पड़ेगा।
  • सच ही कहा है, नेपोलियन ने आज भी सत्ता पाने में लोगों को बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं, तभी तो राजस्थान में सत्ता बच पाई। हां, इसका नतीजा मध्य प्रदेश में सामने आया। बेचारे एक सत्ता लोभी से सत्ता छीन ली गई, दूसरे लोभी के हाथों दे दी गई। 
  • अरे, भई सत्ता उनकी रखैल है, तभी तो आज भारतीय राजनीति में 4-4, 5-5 दशक से एक ही नेता अपने क्षेत्र में सत्ता पर काबिज है। उनके खिलाफ कोई चुनाव लड़े तो बेचारों की जमानत जब्त हो जाती है। 
  • और यदि को त्यागता है तो अपने परिवार या रिश्तेदारों को टिकट दिलवा देते हैं, किसी अन्य को तो मौका ही नहीं देते हैं। जिसके देश में हजारों उदाहरण मिल जाएंगे। 
  • फिर सत्ता पर वही लोग बैठते हैं जो आलाकमान की जी हजूरी करते हैं अब राजस्थान का ही उदाहरण देख ​लीजिए, वर्षों से पार्टी की सेवा करने वाले के सिर ताजपोशी की गई, नहीं तो बड़ी बगावत हो जाती, वैसे भी बगावत तो हुई क्योंकि युवा की उपेक्षा की गई।
  • आज के समय में युवा उपेक्षित हो रहा है जिसका बड़ा कारण है सत्ता के लोभी उम्रदराज नेता अपना वर्चस्व त्यागना नहीं चाहते हैं। वे युवाओं को अवसर नहीं देना चाहते हैं। कुछ राजनीतिक लोगों ने तो पार्टी ऐसी बनाई है कि उसकी कमान परिवार के अलावा किसी दूसरे योग्य व्यक्ति को सौंपने के लिए तैयार नहीं है। बिहार में लालू पार्टी, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और पार्टियां है जिसकी कमान परिवारों के हाथों में है। 


युवाओं के हितों को ध्यान में रखकर यह ब्लॉग लिखा गया है, साथ ही किसी व्यवस्था को दोष देने गलत है क्योंकि मानव प्रवृत्ति स्वार्थी और सत्ता लोभी होती है। कौन गांधीजी और अंबेडकर जी जितना त्याग करेगा, आज वे आदर्श अवश्य है मात्र सत्ता पाने वालों के लिए। अगर सच्चे ही गांधीवादी और अंबेडकरवादी हैं तो पिछले 20 सालों में देश से गरीबी, भेदभाव और शोषण मिट जाता और देश में समरसता आ जाती। 


लेखक 

राकेश सिंह राजपूत

मोबाइल नंबर— 9116783731

इमेज क्रेडिट— राजस्थान पत्रिका